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Thursday, 17 August 2017

क्या लिखना चाहता है ये कवि ?

MAYANK BOKOLIA

मैं कविता लिखना चाहता हूँ "आज़ादी पर"
कोरे कागज़ पर कलम रख उकेरना चाहता हूँ
वो सब जो मैं जी रहा हूँ
वो सब जो मैं देख रहा हूँ
मैं देख रहा हूँ
मेरी कलम हिलने भर से भी इनकार कर रही है
एक अनकही कविता
मेरे सामने गिड़गिड़ा रही है
हाथ जोड़ रही है के मुझे मत गढ़ो
कविता शर्मसार है मुझसे कह रही है
कवितायेँ तो सुन्दर होती है
तुम आज़ादी पर कविताएं मत लिखो

सरकारी अस्पतालों में
सरकार का पैसा अब तक नहीं पहुँचा
राम भरोसे सबकुछ ठीक-ठाक चल रहा है
दफ्तरों की कुर्सियों पर नरभक्षी बैठें है
कच्ची उम्र का कच्चा मांस
इन्हें नमकीन लगता है
गलती किसी की नहीं है
औकात का मामला है
बिट्टू ,सोनू ,मुन्ना
आज सब पतंगे उड़ा रहे होते
आज़ादी की कहानियाँ सुनते
आज़ादी के 70 साल बाद भी
जो आदमी प्राइवेट में इलाज न करा सके
वो आसमान छूती पतंगे क्या ख़ाक उड़ाएंगे
अच्छा है छोटी उम्र में ही मर गए
अच्छा ही तो है
ज़िन्दा रहते भी ,तो क्या उखाड़ लेते
गरीबी से लड़ते
सिस्टम से लड़ते
या और ज्यादा होता तो
कवितायेँ लिखते

हाथ पकडे प्रेम में ये जोड़ा आखिर
किसको डरा सकता है
इनसे किसको डर है
पकड़े जाने पर जब
इनके गालों पर थप्पड़ पड़ रहे थे
ये आज़ाद भारत में
आज़ादी से प्रेम करने की भीख मांग रहे थे

नई-नई स्कीम आ रही है
कालाधन गुलाबी नोटों की शक्ल ले चूका है
किसान को कॉरपोरेट बनाने का सपना है
जहाँ अब तक बिजली नहीं आई
वहां 4जी पहुंचा दिया गया है
स्मार्ट सिटी ,स्मार्ट फोन,
मामला डिजिटल है
किसानों की आत्महत्या
ये सब एक झूठ है
सब स्मार्ट है सबकुछ ओके है
वी आर रोक्किंग ! यो
मुझे देश का प्रधानमंत्री
किसी बंगाली जादूगर के काले जादू की तरह
जादू की तरक़ीब बांटता दिखता है
मुझे सुनाई दे रहा है, लाल किले से
वो बोल रहा है ,उसके पास है
"हस्तमैथुन से छुटकारे के पच्चीस उपाए"
वो ठग रहा है
आपको ,मुझको ,और इस नक़्शे को
जिसमें की तमाम भाषाएँ रंग-रूप सभ्यता
न जाने क्या क्या बसा हुआ है
उसे ये सब बिखरा-बिखरा दिखता
अलग-थलग नज़र आता है
वो सब "एक" करने पर तुला हुआ है
एक सपनों का भारत
एक आज़ाद भारत ।।

#PenMayank

Wednesday, 16 August 2017

उसे अईलाइनर पसंद था मुझे काजल.



लेखक: भास्कर त्रिपाठी


उसे अईलाइनर पसंद था मुझे काजल.

वो फ्रेंच टोस्ट और कॉफ़ी पे मरती थी और मैं अदरक की चाय पे.

उसे नाईट क्लब्स पसंद थे, मुझे रात की शांत सड़कें.

शांत लोग मरे हुए लगते थे उसे, मुझे शांत रहकर उसे सुनना पसंद था.

लेखक बोरिंग लगते थे उसे, पर मुझे मिनटों देखा करती, जब मैं लिखता.

वो न्यू यॉर्क के टाइम्स स्क्वायर, इस्तांबुल के ग्रैंड बाज़ार में शौपिंग के सपने देखती थी,

मैं असम के चाय के बागों में खोना चाहता था, मसूरी के लाल टिब्बे में बैठकर सूरज डूबता देखना चाहता था.

उसकी बातों में महंगे शहर थे, और मेरा तो पूरा शहर ही वो.

न मैंने उसे बदलना चाहा, न उसने मुझे.

अच्छा चला था इसी तरह सब.

एक अरसा हुआ, दोनों को रिश्ते से आगे बढे.

कुछ दिन पहले उनके साथ ही रहने वाली एक दोस्त से पता चला…

वो अब शांत रहने लगीं हैं,

लिखने लगीं हैं. मसूरी भी घूम आईं, लाल टिब्बे पर अँधेरे तक बैठी रहीं.

आधी रात को अचानक से उनका मन अब, चाय पीने का करता है.

और मैं…

मैं भी अब अकसर कॉफ़ी पी लेता हूँ, किसी महंगी जगह बैठक.


Author: Bhasker Tripathi

Sunday, 13 August 2017

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

सब क़त्ल हो के तेरे मुक़ाबिल से आए हैं
हम लोग सुर्ख़-रू हैं कि मंज़िल से आए हैं
शम-ए-नज़र ख़याल के अंजुम जिगर के दाग़
जितने चराग़ हैं तिरी महफ़िल से आए हैं
उठ कर तो गए हैं तिरी बज़्म से मगर
कुछ दिल ही जानता है कि किस दिल से आए हैं
हर इक क़दम अजल था हर इक गाम ज़िंदगी
हम घूम फिर के कूचा-ए-क़ातिल से आए हैं
बाद-ए-ख़िज़ाँ का शुक्र करो 'फ़ैज़' जिस के हाथ
नामे किसी बहार-ए-शिमाइल से आए हैं

Wednesday, 9 August 2017

मैं लाख कह दूँ कि आकाश हूँ ज़मीं हूँ मैं : राहत इंदौरी


मैं लाख कह दूँ कि आकाश हूँ ज़मीं हूँ मैं ।
मगर उसे तो ख़बर है कि कुछ नहीं हूँ मैं ।।

अजीब लोग हैं मेरी तलाश में मुझ को ।
वहाँ पे ढूँड रहे हैं जहाँ नहीं हूँ मैं ।।

मैं आईनों से तो मायूस लौट आया था ।
मगर किसी ने बताया बहुत हसीं हूँ मैं ।।

वो ज़र्रे ज़र्रे में मौजूद है मगर मैं भी ।
कहीं कहीं हूँ कहाँ हूँ कहीं नहीं हूँ मैं ।।

वो इक किताब जो मंसूब तेरे नाम से है ।
उसी किताब के अंदर कहीं कहीं हूँ मैं ।।

सितारो आओ मिरी राह में बिखर जाओ ।
ये मेरा हुक्म है हालाँकि कुछ नहीं हूँ मैं ।।

यहीं हुसैन भी गुज़रे यहीं यज़ीद भी था ।
हज़ार रंग में डूबी हुई ज़मीं हूँ मैं ।।

ये बूढ़ी क़ब्रें तुम्हें कुछ नहीं बताएँगी ।
मुझे तलाश करो दोस्तो यहीं हूँ मैं ।।

- राहत इंदौरी

Tuesday, 1 August 2017

खिलौना


बीच बाज़ार 
खिलौने वाले 
के खिलौने 
की आवाज़ से 
आकर्षित हो 
कदम उसकी 
तरफ बढ़े,
मैंने छुआ,
सहलाया उन्हें 
व एक खिलौने 
को अंक में भरा
कि पीछे से कर्कष 
आवाज़ ने मुझे 
झंझोड़ा 
‘‘तुम्हारी बच्चों की सी 
हरकतें कब खत्म होंगी!’’
सुनकर मेरा नन्हा बच्चा 
सहम सा गया 
मेरी प्रौढ़ देह के अन्दर।

- शबनम शर्मा

Sunday, 30 July 2017

शिकवा | अल्लामा इक़बाल


क्यूँ ज़याँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँ

फ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँ

नाले बुलबुल के सुनूँ और हमा-तन गोश रहूँ

हम-नवा मैं भी कोई गुल हूँ कि ख़ामोश रहूँ

जुरअत-आमोज़ मिरी ताब-ए-सुख़न है मुझ को

शिकवा अल्लाह से ख़ाकम-ब-दहन है मुझ को

है बजा शेवा-ए-तस्लीम में मशहूर हैं हम

क़िस्सा-ए-दर्द सुनाते हैं कि मजबूर हैं हम

साज़ ख़ामोश हैं फ़रियाद से मामूर हैं हम

नाला आता है अगर लब पे तो माज़ूर हैं हम

ऐ ख़ुदा शिकवा-ए-अर्बाब-ए-वफ़ा भी सुन ले

ख़ूगर-ए-हम्द से थोड़ा सा गिला भी सुन ले

थी तो मौजूद अज़ल से ही तिरी ज़ात-ए-क़दीम

फूल था ज़ेब-ए-चमन पर न परेशाँ थी शमीम

शर्त इंसाफ़ है ऐ साहिब-ए-अल्ताफ़-ए-अमीम

बू-ए-गुल फैलती किस तरह जो होती न नसीम

हम को जमईयत-ए-ख़ातिर ये परेशानी थी

वर्ना उम्मत तिरे महबूब की दीवानी थी

हम से पहले था अजब तेरे जहाँ का मंज़र

कहीं मस्जूद थे पत्थर कहीं माबूद शजर

ख़ूगर-ए-पैकर-ए-महसूस थी इंसाँ की नज़र

मानता फिर कोई अन-देखे ख़ुदा को क्यूँकर

तुझ को मालूम है लेता था कोई नाम तिरा

क़ुव्वत-ए-बाज़ू-ए-मुस्लिम ने किया काम तिरा

बस रहे थे यहीं सल्जूक़ भी तूरानी भी

अहल-ए-चीं चीन में ईरान में सासानी भी

इसी मामूरे में आबाद थे यूनानी भी

इसी दुनिया में यहूदी भी थे नसरानी भी

पर तिरे नाम पे तलवार उठाई किस ने

बात जो बिगड़ी हुई थी वो बनाई किस ने

थे हमीं एक तिरे मारका-आराओं में

ख़ुश्कियों में कभी लड़ते कभी दरियाओं में

दीं अज़ानें कभी यूरोप के कलीसाओं में

कभी अफ़्रीक़ा के तपते हुए सहराओं में

शान आँखों में न जचती थी जहाँ-दारों की

कलमा पढ़ते थे हमीं छाँव में तलवारों की

हम जो जीते थे तो जंगों की मुसीबत के लिए

और मरते थे तिरे नाम की अज़्मत के लिए

थी न कुछ तेग़ज़नी अपनी हुकूमत के लिए

सर-ब-कफ़ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिए

क़ौम अपनी जो ज़र-ओ-माल-ए-जहाँ पर मरती

बुत-फ़रोशीं के एवज़ बुत-शिकनी क्यूँ करती

टल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थे

पाँव शेरों के भी मैदाँ से उखड़ जाते थे

तुझ से सरकश हुआ कोई तो बिगड़ जाते थे

तेग़ क्या चीज़ है हम तोप से लड़ जाते थे

नक़्श-ए-तौहीद का हर दिल पे बिठाया हम ने

ज़ेर-ए-ख़ंजर भी ये पैग़ाम सुनाया हम ने

तू ही कह दे कि उखाड़ा दर-ए-ख़ैबर किस ने

शहर क़ैसर का जो था उस को किया सर किस ने

तोड़े मख़्लूक़ ख़ुदावंदों के पैकर किस ने

काट कर रख दिए कुफ़्फ़ार के लश्कर किस ने

किस ने ठंडा किया आतिश-कदा-ए-ईराँ को

किस ने फिर ज़िंदा किया तज़्किरा-ए-यज़्दाँ को

कौन सी क़ौम फ़क़त तेरी तलबगार हुई

और तेरे लिए ज़हमत-कश-ए-पैकार हुई

किस की शमशीर जहाँगीर जहाँ-दार हुई

किस की तकबीर से दुनिया तिरी बेदार हुई

किस की हैबत से सनम सहमे हुए रहते थे

मुँह के बल गिर के हू-अल्लाहू-अहद कहते थे

आ गया ऐन लड़ाई में अगर वक़्त-ए-नमाज़

क़िबला-रू हो के ज़मीं-बोस हुई क़ौम-ए-हिजाज़

एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़

न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा-नवाज़

बंदा ओ साहब ओ मोहताज ओ ग़नी एक हुए

तेरी सरकार में पहुँचे तो सभी एक हुए

महफ़िल-ए-कौन-ओ-मकाँ में सहर ओ शाम फिरे

मय-ए-तौहीद को ले कर सिफ़त-ए-जाम फिरे

कोह में दश्त में ले कर तिरा पैग़ाम फिरे

और मालूम है तुझ को कभी नाकाम फिरे

दश्त तो दश्त हैं दरिया भी न छोड़े हम ने

बहर-ए-ज़ुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हम ने

सफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया हम ने

नौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया हम ने

तेरे काबे को जबीनों से बसाया हम ने

तेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया हम ने

फिर भी हम से ये गिला है कि वफ़ादार नहीं

हम वफ़ादार नहीं तू भी तो दिलदार नहीं

उम्मतें और भी हैं उन में गुनहगार भी हैं

इज्ज़ वाले भी हैं मस्त-ए-मय-ए-पिंदार भी हैं

उन में काहिल भी हैं ग़ाफ़िल भी हैं हुश्यार भी हैं

सैकड़ों हैं कि तिरे नाम से बे-ज़ार भी हैं

रहमतें हैं तिरी अग़्यार के काशानों पर

बर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलामानों पर

बुत सनम-ख़ानों में कहते हैं मुसलमान गए

है ख़ुशी उन को कि काबे के निगहबान गए

मंज़िल-ए-दहर से ऊँटों के हुदी-ख़्वान गए

अपनी बग़लों में दबाए हुए क़ुरआन गए

ख़ंदा-ज़न कुफ़्र है एहसास तुझे है कि नहीं

अपनी तौहीद का कुछ पास तुझे है कि नहीं

ये शिकायत नहीं हैं उन के ख़ज़ाने मामूर

नहीं महफ़िल में जिन्हें बात भी करने का शुऊर

क़हर तो ये है कि काफ़िर को मिलें हूर ओ क़ुसूर

और बेचारे मुसलमाँ को फ़क़त वादा-ए-हूर

अब वो अल्ताफ़ नहीं हम पे इनायात नहीं

बात ये क्या है कि पहली सी मुदारात नहीं

क्यूँ मुसलामानों में है दौलत-ए-दुनिया नायाब

तेरी क़ुदरत तो है वो जिस की न हद है न हिसाब

तू जो चाहे तो उठे सीना-ए-सहरा से हबाब

रह-रव-ए-दश्त हो सैली-ज़दा-ए-मौज-ए-सराब

तान-ए-अग़्यार है रुस्वाई है नादारी है

क्या तिरे नाम पे मरने का एवज़ ख़्वारी है

बनी अग़्यार की अब चाहने वाली दुनिया

रह गई अपने लिए एक ख़याली दुनिया

हम तो रुख़्सत हुए औरों ने सँभाली दुनिया

फिर न कहना हुई तौहीद से ख़ाली दुनिया

हम तो जीते हैं कि दुनिया में तिरा नाम रहे

कहीं मुमकिन है कि साक़ी न रहे जाम रहे

तेरी महफ़िल भी गई चाहने वाले भी गए

शब की आहें भी गईं सुब्ह के नाले भी गए

दिल तुझे दे भी गए अपना सिला ले भी गए

आ के बैठे भी न थे और निकाले भी गए

आए उश्शाक़ गए वादा-ए-फ़र्दा ले कर

अब उन्हें ढूँड चराग़-ए-रुख़-ए-ज़ेबा ले कर

दर्द-ए-लैला भी वही क़ैस का पहलू भी वही

नज्द के दश्त ओ जबल में रम-ए-आहू भी वही

इश्क़ का दिल भी वही हुस्न का जादू भी वही

उम्मत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल भी वही तू भी वही

फिर ये आज़ुर्दगी-ए-ग़ैर सबब क्या मअ'नी

अपने शैदाओं पे ये चश्म-ए-ग़ज़ब क्या मअ'नी

तुझ को छोड़ा कि रसूल-ए-अरबी को छोड़ा

बुत-गरी पेशा किया बुत-शिकनी को छोड़ा

इश्क़ को इश्क़ की आशुफ़्ता-सरी को छोड़ा

रस्म-ए-सलमान ओ उवैस-ए-क़रनी को छोड़ा

आग तकबीर की सीनों में दबी रखते हैं

ज़िंदगी मिस्ल-ए-बिलाल-ए-हबशी रखते हैं

इश्क़ की ख़ैर वो पहली सी अदा भी न सही

जादा-पैमाई-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा भी न सही

मुज़्तरिब दिल सिफ़त-ए-क़िबला-नुमा भी न सही

और पाबंदी-ए-आईन-ए-वफ़ा भी न सही

कभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई है

बात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई है

सर-ए-फ़ाराँ पे किया दीन को कामिल तू ने

इक इशारे में हज़ारों के लिए दिल तू ने

आतिश-अंदोज़ किया इश्क़ का हासिल तू ने

फूँक दी गर्मी-ए-रुख़्सार से महफ़िल तू ने

आज क्यूँ सीने हमारे शरर-आबाद नहीं

हम वही सोख़्ता-सामाँ हैं तुझे याद नहीं

वादी-ए-नज्द में वो शोर-ए-सलासिल न रहा

क़ैस दीवाना-ए-नज़्ज़ारा-ए-महमिल न रहा

हौसले वो न रहे हम न रहे दिल न रहा

घर ये उजड़ा है कि तू रौनक़-ए-महफ़िल न रहा

ऐ ख़ुशा आँ रोज़ कि आई ओ ब-सद नाज़ आई

बे-हिजाबाना सू-ए-महफ़िल-ए-मा बाज़ आई

बादा-कश ग़ैर हैं गुलशन में लब-ए-जू बैठे

सुनते हैं जाम-ब-कफ़ नग़्मा-ए-कू-कू बैठे

दौर हंगामा-ए-गुलज़ार से यकसू बैठे

तेरे दीवाने भी हैं मुंतज़िर-ए-हू बैठे

अपने परवानों को फिर ज़ौक़-ए-ख़ुद-अफ़रोज़ी दे

बर्क़-ए-देरीना को फ़रमान-ए-जिगर-सोज़ी दे

क़ौम-ए-आवारा इनाँ-ताब है फिर सू-ए-हिजाज़

ले उड़ा बुलबुल-ए-बे-पर को मज़ाक़-ए-परवाज़

मुज़्तरिब-बाग़ के हर ग़ुंचे में है बू-ए-नियाज़

तू ज़रा छेड़ तो दे तिश्ना-ए-मिज़राब है साज़

नग़्मे बेताब हैं तारों से निकलने के लिए

तूर मुज़्तर है उसी आग में जलने के लिए

मुश्किलें उम्मत-ए-मरहूम की आसाँ कर दे

मोर-ए-बे-माया को हम-दोश-ए-सुलेमाँ कर दे

जींस-ए-ना-याब-ए-मोहब्बत को फिर अर्ज़ां कर दे

हिन्द के दैर-नशीनों को मुसलमाँ कर दे

जू-ए-ख़ूँ मी चकद अज़ हसरत-ए-दैरीना-ए-मा

मी तपद नाला ब-निश्तर कद-ए-सीना-ए-मा

बू-ए-गुल ले गई बैरून-ए-चमन राज़-ए-चमन

क्या क़यामत है कि ख़ुद फूल हैं ग़म्माज़-ए-चमन

अहद-ए-गुल ख़त्म हुआ टूट गया साज़-ए-चमन

उड़ गए डालियों से ज़मज़मा-पर्दाज़-ए-चमन

एक बुलबुल है कि महव-ए-तरन्नुम अब तक

उस के सीने में है नग़्मों का तलातुम अब तक

क़ुमरियाँ शाख़-ए-सनोबर से गुरेज़ाँ भी हुईं

पत्तियाँ फूल की झड़ झड़ के परेशाँ भी हुईं

वो पुरानी रविशें बाग़ की वीराँ भी हुईं

डालियाँ पैरहन-ए-बर्ग से उर्यां भी हुईं

क़ैद-ए-मौसम से तबीअत रही आज़ाद उस की

काश गुलशन में समझता कोई फ़रियाद उस की

लुत्फ़ मरने में है बाक़ी न मज़ा जीने में

कुछ मज़ा है तो यही ख़ून-ए-जिगर पीने में

कितने बेताब हैं जौहर मिरे आईने में

किस क़दर जल्वे तड़पते हैं मिरे सीने में

इस गुलिस्ताँ में मगर देखने वाले ही नहीं

दाग़ जो सीने में रखते हों वो लाले ही नहीं

चाक इस बुलबुल-ए-तन्हा की नवा से दिल हों

जागने वाले इसी बाँग-ए-दिरा से दिल हों

यानी फिर ज़िंदा नए अहद-ए-वफ़ा से दिल हों

फिर इसी बादा-ए-दैरीना के प्यासे दिल हों

अजमी ख़ुम है तो क्या मय तो हिजाज़ी है मिरी

नग़्मा हिन्दी है तो क्या लय तो हिजाज़ी है मिरी

Wednesday, 26 July 2017

हरिवंश राय बच्चन


नाम–हरिवंश राय श्रीवास्तव उर्फ़ बच्चन।
जन्म–  27 नवम्बर 1907 बाबुपत्ति गाव। (प्रतापगढ़ जि.)
पिता–प्रताप नारायण श्रीवास्तव।
माता– सरस्वती देवी।
पत्नी– श्यामा बच्चन, उनके मृत्यु के बाद तेजी बच्चन से विवाह।
सन्तान–  अमिताभ और अजिताभ।

आरंभिक जीवन:

        बच्चन का जन्म 27 नवम्बर 1907 को इलाहाबाद से सटे प्रतापगढ़ जिले के एक छोटे से गाँव बाबूपट्टी में एक कायस्थ परिवार मे हुआ था। इनके पिता का नाम प्रताप नारायण श्रीवास्तव तथा माता का नाम सरस्वती देवी था। इनको बाल्यकाल में 'बच्चन' कहा जाता था जिसका शाब्दिक अर्थ 'बच्चा' या संतान होता है। बाद में ये इसी नाम से मशहूर हुए। इन्होंने कायस्थ पाठशाला में पहले उर्दू की शिक्षा ली जो उस समय कानून की डिग्री के लिए पहला कदम माना जाता था। उन्होने प्रयाग विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम. ए. और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य के विख्यात कवि डब्लू बी यीट्स की कविताओं पर शोध कर पीएच. डी. पूरी की।
१९२६ में १९ वर्ष की उम्र में उनका विवाह श्यामा बच्चन से हुआ जो उस समय १४ वर्ष की थीं। लेकिन १९३६ में श्यामा की टीबी के कारण मृत्यु हो गई। पांच साल बाद १९४१ में बच्चन ने एक पंजाबन तेजी सूरी से विवाह किया जो रंगमंच तथा गायन से जुड़ी हुई थीं। इसी समय उन्होंने 'नीड़ का पुनर्निर्माण' जैसे कविताओं की रचना की। तेजी बच्चन से अमिताभ तथा अजिताभ दो पुत्र हुए। अमिताभ बच्चन एक प्रसिद्ध अभिनेता हैं। तेजी बच्चन ने हरिवंश राय बच्चन द्वारा शेक्सपियर के अनूदित कई नाटकों में अभिनय का काम किया है।

        हरिवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवंबर 1907 को इलाहाबाद के पास प्रतापगढ़ जिले के एक छोटे से गाँव पट्टी में हुआ था। हरिवंश राय ने 1938 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अँग्रेज़ी साहित्य में एम. ए किया व 1952 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवक्ता रहे। 1926 में हरिवंश राय की शादी श्यामा से हुई थी जिनका टीबी की लंबी बीमारी के बाद 1936 में निधन हो गया।  इस बीच वे नितांत अकेले पड़ गए। 1941 में बच्चन ने तेजी सूरी से शादी की।1952 में पढ़ने के लिए इंग्लैंड चले गए, जहां कैम्ब्रिज  विश्वविद्यालय  में  अंग्रेजी साहित्य/काव्य  पर शोध किया। 1955 में कैम्ब्रिज से वापस आने के बाद आपकी भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिन्दी विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त हो गई। आप राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी रहे और 1976 में आपको पद्मभूषण की उपाधी मिली। इससे पहले आपको 'दो चट्टानें' (कविता–संग्रह) के लिए 1968 में साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी मिला था।

        1955 में, हरिवंशराय बच्चन दिल्ली में एक्सटर्नल विभाग में शामिल हुए जहा उन्होंने बहोत सालो तक सेवा की और हिंदी भाषा के विकास में भी जुड़े। उन्होंने अपने कई लेखो द्वारा हिंदी भाषा को प्रध्यान्य भी दिया। एक कवी की तरह वो अपनी कविता मधुशाला के लिए प्रसिद्ध है। ओमर खय्याम की ही तरह उन्होंने भी शेकस्पिअर मैकबेथ और ऑथेलो और भगवत गीता के हिंदी अनुवाद के लिए हमेशा याद किये जायेंगे। इसी तरह नवम्बर 1984 में उन्होंने अपनी आखिरी कविता लिखी “एक नवम्बर 1984” जो इंदिरा गाँधी हत्या पर आधारित थी।

        1966 में हरिवंशराय बच्चन का भारतीय राज्य सभा के लिए नामनिर्देशित हुआ और इसके तीन साल बाद ही सरकार ने उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया। 1976 में, उनके हिंदी भाषा के विकास में अभूतपूर्व योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया गया.और उनके सफल जीवनकथा, क्या भूलू क्या याद रखु, नीदा का निर्मन फिर, बसेरे से दूर और दशद्वार से सोपान तक के लिए सरस्वती सम्मान दिया गया। इसी के साथ उन्हें नेहरू पुरस्कार लोटस पुरस्कार भी मिले है। अगर हम उन के बारे में प्रस्तावना जान्ने की कोशिश करे तो वन उन्होंने बहोत आसान बताई है। मिटटी का तन, मस्ती का मन, क्षण भर जीवन- यही उनका परिचय है।

प्रेरणा:

        'बच्चन' ने इस 'हालावाद' के द्वारा व्यक्ति जीवन की सारी नीरसताओं को स्वीकार करते हुए भी उससे मुँह मोड़ने के बजाय उसका उपयोग करने की, उसकी सारी बुराइयों और कमियों के बावज़ूद जो कुछ मधुर और आनन्दपूर्ण होने के कारण गाह्य है, उसे अपनाने की प्रेरणा दी। उर्दू कवियों ने 'वाइज़' और 'बज़ा', मस्जिद और मज़हब, क़यामत और उक़वा की परवाह न करके दुनिया-ए-रंगों-बू को निकटता से, बार-बार देखने, उसका आस्वादन करने का आमंत्रण दिया है। ख़्याम ने वर्तमान क्षण को जानने, मानने, अपनाने और भली प्रकार इस्तेमाल करने की सीख दी है, और 'बच्चन' के 'हालावाद' का जीवन-दर्शन भी यही है। यह पलायनवाद नहीं है, क्योंकि इसमें वास्तविकता का अस्वीकरण नहीं है, न उससे भागने की परिकल्पना है, प्रत्युत्त वास्तविकता की शुष्कता को अपनी मनस्तरंग से सींचकर हरी-भरी बना देने की सशक्त प्रेरणा है। यह सत्य है कि 'बच्चन' की इन कविताओं में रूमानियत और क़सक़ है, पर हालावाद ग़म ग़लत करने का निमंत्रण है; ग़म से घबराकर ख़ुदक़शी करने का नहीं।

        'बच्चन' की कविता इतनी सर्वग्राह्य और सर्वप्रिय है क्योंकि 'बच्चन' की लोकप्रियता मात्र पाठकों के स्वीकरण पर ही आधारित नहीं थी। जो कुछ मिला वह उन्हें अत्यन्त रुचिकर जान पड़ा। वे छायावाद के अतिशय सुकुमार्य और माधुर्य से, उसकी अतीन्द्रिय और अति वैयक्तिक सूक्ष्मता से, उसकी लक्षणात्मक अभिव्यंजना शैली से उकता गये थे। उर्दू की गज़लों में चमक और लचक थी, दिल पर असर करने की ताक़त थी, वह सहजता और संवेदना थी, जो पाठक या श्रोता के मुँह से बरबस यह कहलवा सकती थी कि, मैंने पाया यह कि गोया वह भी मेरे दिल में है। मगर हिन्दी कविता जनमानस और जन रुचि से बहुत दूर थी। 'बच्चन' ने उस समय (1935 से 1940 ई. के व्यापक खिन्नता और अवसाद के युग में) मध्यवर्ग के विक्षुब्ध, वेदनाग्रस्त मन को वाणी का वरदान दिया। उन्होंने सीधी, सादी, जीवन्त भाषा और सर्वग्राह्य, गेय शैली में, छायावाद की लाक्षणिक वक्रता की जगह संवेदनासिक्त अभिधा के माध्यम से, अपनी बात कहना आरम्भ किया और हिन्दी काव्य रसिक सहसा चौंक पड़ा, क्योंकि उसने पाया यह कि वह भी उसके दिल में है।

लेखन:

        लिखने का उत्साह बच्चन में विद्यार्थी जीवन से ही था। एम.ए के अध्ययन काल में ही उन्होने फ़ारसी के प्रसिद्ध कवि ‘उमर ख्य्याम की रुबाईयों का हिन्दी में अनुवाद किया, जिसने उन्हे नौजवानों का प्रिय बना दिया था। इसी से उत्साहित हो उन्होंनें उसी शैली में अनेक मौलिक रचनायें लिखीं, जो मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश आदि में संग्रहित हैं। अपनी गेयता, सरलता, सरसता के कारण ये काव्य संग्रह बहुत ही पसंद किये गये। बच्चन आधुनिक काल की वैयक्तिक काव्यधारा के अग्रणी कवि हैं। व्यक्तिप्रधान गीतों के कवि के रूप में उन्होंने आत्मपरकता, निराशा और वेदना को अपने काव्य का विषय बनाया है। उनकी प्रसिद्ध काव्य कृतियों में निशा निमंत्रण, मिलनयामिनी, धार के इधर उधर, आदि भी प्रमुख हैं। उनकी गद्य रचनाओं में - क्या भूलूं क्या याद करूं, टूटी छूटी कडियाँ, नीड का निर्माण फिर फिर आदि प्रमुख हैं। विषय और शैली की दृष्टि से स्वाभाविकता बच्चन की कविताओं का उल्लेखनीय गुण है। उनकी भाषा बोलचाल की भाषा होते हुए भी प्रभावशाली है। लोकधुनों पर आधारित भी उन्होने अनेकों गीत लिखें हैं। सहजता और संवेदनशीलता उनकी कविता का एक विशेष गुण है। यह सहजता और सरल संवेदना कवि की अनुभूति मूलक सत्यता के कारण उपलब्ध हो सकी। बच्चन जी ने बडे साहस, धैर्य और सच्चाई के साथ सीधी-सादी भाषा और शैली में सहज कल्पनाशीलता और जीवन्त बिम्बों से सजाकर सँवारकर अनूठे गीत हिन्दी को दिए। 18 जनवरी सन् 2003 को मुम्बई में आपका निधन हो गया।

कविताएँ:

•तेरा हार। (1932)
•मधुशाला। (1935)
•मधुबाला। (1936)
•मधुकलश। (1937)
•निशा निमन्त्रण। (1938)
•एकांत-संगीत। (1939)
•आकुल अंतर। (1943)
•सतरंगिनी।  (1945)
•हलाहल।  (1946)
•बंगाल का काल।  (1946)
•खादी के फूल। (1948)
•सूत की माला।  (1948)
•मिलन यामिनी। (1950)
•प्रणय पत्रिका। (1955)
•धार के इधर उधर। (1957)
•आरती और अंगारे। (1958)
•बुद्ध और नाचघर। (1958)
•त्रिभंगिमा। (1961)
•चार खेमे चौंसठ खूंटे। (1962)
•चिड़िया का घर।
•सबसे पहले।
•काला कौआ।

रचनाएँ:

•युग की उदासी।
•आज मुझसे बोल बादल।
•क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी।
•साथी सो ना कर कुछ बात।
•तब रोक ना पाया मैं आंसू।
•तुम गा दो मेरा गान अमर हो जाये।
•आज तुम मेरे लिये हो।
•मनुष्य की मूर्ति।
•हम ऐसे आज़ाद।
•उस पार न जाने क्या होगा।
•रीढ़ की हड्डी।
•हिंया नहीं कोऊ हमार!
•एक और जंज़ीर तड़कती है, भारत माँ की जय बोलो।
•जीवन का दिन बीत चुका था छाई थी जीवन की रात।
•हो गयी मौन बुलबुले-हिंद।
•गर्म लोहा।
•टूटा हुआ इंसान।
•मौन और शब्द।
•शहीद की माँ।
•क़दम बढाने वाले: कलम चलाने वाले।
•एक नया अनुभव।
•दो पीढियाँ।
•क्यों जीता हूँ।
•कौन मिलनातुर नहीं है?
•है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?
•तीर पर कैसे रुकूँ मैं आज लहरों में निमंत्रण!
•क्यों पैदा किया था? 

Tuesday, 25 July 2017

उड़ता हुआ ग़ुबार हूँ मैं...


तलाश-ए-यार में उड़ता हुआ ग़ुबार हूँ मैं
पड़ी है लाश मेरी और क़ब्र से फ़रार हू मैं

- साभार

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© ASIM KHAN

अब और कहने कि ज़रुरत नहीं।


सआदत हसन मन्टो :

ये दुनिया भी अजीब-ओ-ग़रीब है ख़ासकर आज का ज़माना क़ानून को जिस तरह फ़रेब दिया जाता है, इस के मुताल्लिक़ शायद आप को ज़्यादा इलम ना हो। आजकल क़ानून एक बे-मानी चीज़ बन कर रह गया है । उधर कोई नया क़ानून बनता है, उधर यार लोग उस का तोड़ सोच लेते हैं, इस के इलावा अपने बचाओ की कई सूरतों पैदा कर लेते हैं।

किसी अख़बार पर आफ़त आनी हो तो आया करे, उस का मालिक महफ़ूज़-ओ-मामून रहेगा, इस लिए कि प्रिंट लाईन में किसी कसाई या धोबी का नाम बहैसियत प्रिंटर पब्लिशर और ऐडीटर के दर्ज होगा । अगर अख़बार में कोई ऐसी तहरीर छप गई जिस पर गर्वनमैंट को एतराज़ हो तो असल मालिक के बजाय वो धोबी या कसाई गिरिफ़्त में आ जाएगा। उस को जुर्माना होगा या क़ैद। जुर्माना तो ज़ाहिर है अख़बार का मालिक अदा कर देगा, मगर क़ैद तो वो अदा नहीं कर सकता। लेकिन इन दो पार्टियों के दरमयान इस क़िस्म का मुआहिदा होता है कि अगर क़ैद हुई तो वो उस के घर इतने रुपय माहवार पहुंचा दिया करेगा। ऐसे मुआहिदे में ख़िलाफ़-वर्ज़ी बहुत कम होती है।
जो लोग नाजायज़ तौर पर शराब बेचते हैं, उन के पास दो तीन आदमी ऐसे ज़रूर मौजूद होते हैं जिन का सिर्फ़ ये काम है कि अगर पुलिस छापा मारे तो वो गिरफ़्तार हो जाएं और चंद माह की क़ैद काट कर वापस आ जाएं इस का मुआवज़ा उन को माक़ूल मिल जाता है।

छापा मारने वाले भी पहले ही से मुत्तला कर देते हैं कि हम आरहे हैं, तुम अपना इंतिज़ाम कर लो चुनांचे फ़ौरन इंतिज़ाम कर लिया जाता है, यानी मालिक ग़ाइब ग़ुल्ला हो जाता है और वो किराए के आदमी गिरफ़्तार हो जाते हैं ये भी एक क़िस्म की मुलाज़मत है लेकिन दुनिया में जितनी मुलाज़मतें हैं कुछ इसी क़िस्म की होती हैं।

मैं जब अमीन पहलवान से मिला तो वो तीन महीने की क़ैद काट कर वापस आया था। मैंने उस से पूछा : 

“अमीन! इस दफ़ा कैसे जेल में गए?”

अमीन मुस्कुराया: “अपने कारोबार के सिलसिले में”

“क्या कारोबार था?”

“जो रहा, वो है।”

“भई बताओ तो ”

“बताने की क्या ज़रूरत है आप अच्छी तरह जानते हैं मगर ख़्वाह-मख़्वाह मुझ से पूछ रहे हैं।”

मैंने थोड़े से तवक्कुफ़ के बाद इस से कहा “अमीन! तुम्हें आए दिन जेल में जाना क्या पसंद है?”
अमीन पहलवान मुस्कुराया: “जनाब पसंद और न पसंद का सवाल ही पैदा नहीं होता लोग मुझे पहलवान कहते हैं हालाँकि मैंने आज तक अखाड़े की शक्ल नहीं देखी अन-पढ़ हूँ कोई और हुनर भी मुझे नहीं आता बस, जेल जाना आता है। वहां मैं ख़ुश रहता हूँ मुझे कोई तकलीफ़ महसूस नहीं होती आप हर रोज़ दफ़्तर जाते हैं क्या वो जेल नहीं ”
मैं ला-जवाब होगया: “तुम ठीक कहते हो। अमीन लेकिन दफ़्तर जाने वालों का मुआमला दूसरा है लोग उन्हें बुरी निगाहों से नहीं देखते।”

“क्यों नहीं देखते! ज़िला कचहरी के जितने मुंशी और क्लर्क हैं उन्हें कौन अच्छी नज़र से देखता है रिश्वतें लेते हैं झूट बोलते हैं और प्रले दर्जे के मक्कार होते हैं।”
“मुझ में ऐसा कोई ऐब नहीं मैं अपनी रोज़ी बड़ी ईमानदारी से कमाता हूँ।”
मैंने इस से पूछा “किस तरह?”
उस ने जवाब दिया : “इस तरह कि अगर किसी का काम करता हूँ और क़ैद काटता हूँ जेल में मेहनत मशक़्क़त करता हूँ और बाद में उस शख़्स से जिस की ख़ातिर मैंने सज़ा भुगती थी, मुझे दो तीन सौ रुपया मिलता है तो ये मेरा मुआवज़ा है, इस पर किसी को क्या एतराज़ हो सकता है मैं रिश्वत तो नहीं लेता हलाल की कमाई खाता हूँ। लोग मुझे गुंडा समझते हैं बड़ा ख़तरनाक गुंडा लेकिन मैं आप को बताऊं कि मैंने आज तक किसी के थप्पड़ भी नहीं मारा। मेरी लाईन बिलकुल अलग है ”

उस की लाईन वाक़ई दूसरों से अलग थी मुझे हैरत थी कि तीन चार मर्तबा क़ैद काटने के बावजूद उस में कोई तबदीली वाक़्य नहीं हुई। वो बड़ा संजीदा मगर गंवार क़िस्म का आदमी था जिस को किसी की पर्वा नहीं थी। क़ैद काटने के बाद जब भी आता तो इस का वज़न कम अज़ कम दस पाऊंड ज़्यादा होता।
एक दिन मैंने उस से पूओछा “अमीन क्या वहां का खाना तुम्हें रास आता है?”
उस ने अपने मख़सूस अंदाज़ में जवाब दिया : “खाना कैसा भी हो, उस को रास करना आदमी का अपना काम है मुझे दाल से नफ़रत थी, लेकिन जब पहली मर्तबा मुझे वहां कंकरों भरी दाल दी गई और रेत मिली रोटी तो मैंने कहा अमीन यार ये सब से अच्छा खाना है, खा, डिनर पेल और ख़ुदा का शुक्र बजा ला। चुनांचे मैं एक दो रोज़ ही में आदी होगया मशक़्क़त करता, खाना खाता और यूं महसूस करता जैसे मैंने गंजे के होटल से पेट भर कर खाना खाया है।”
मैंने एक दिन इस से पूछा : “तुम ने कभी किसी औरत से भी मुहब्बत की है?”
उस ने अपने दोनों कान पकड़े “ख़ुदा बचाए इस मुहब्बत से मुझे सिर्फ़ अपनी माँ से मुहब्बत है।”
मैंने उस से पूछा: “तुम्हारी माँ ज़िंदा है?”
“जी हाँ ख़ुदा के फ़ज़्ल-ओ-करम से बहुत बूढ़ी है लेकिन आप की दुआ से उस का साया मेरे सर पर देर तक क़ायम रहेगा और वो तो हर वक़्त मेरे लिए दुआएं मांगती रहती है कि ख़ुदा मुझे नेकी की हिदायत करे ”
मैंने उस से कहा : ख़ुदा तुम्हारी माँ को सलामत रखे! पर मैंने ये पूछा था कि तुम्हें किसी औरत से मुहब्बत हुई या नहीं देखो, झूट नहीं बोलना!”
अमीन पहलवान ने बड़े तेज़ लहजे में कहा : “मैंने अपनी ज़िंदगी में आज तक कभी झूट नहीं बोला मैंने किसी औरत से मुहब्बत नहीं की।”
मैंने पूछा : “क्यों”
उस ने जवाब दिया : “इस लिए कि मुझे उस से दिलचस्पी ही नहीं।”
मैं ख़ामोश हो रहा।
तीसरे रोज़ उस की माँ पर फ़ालिज गिरा और वो राहि-ए-मुल्क-ए-अदम हुई। अमीन पहलवान के पास एक पैसा भी नहीं था। वो सोगवार, मग़्मूम और दिल शिकस्ता बैठा था कि शहर के एक रईस की तरफ़ से उसे बुलावा आया। वो अपनी अज़ीज़ माँ की मय्यत छोड़कर उस के पास गया और उस से पूछा : “क्यों मियां साहब, आप ने मुझे क्यों बुलाया है?”
मियां साहिब ने कहा : “तुम्हें क्यों बुलाया जाता है एक ख़ास काम है”
अमीन ने जिस के दिल-ओ-दिमाग़ में अपनी माँ का कफ़न दफ़न तेर रहा था पूछा: “हुज़ूर ये ख़ास काम क्या है?”
मियां साहब ने सिगरेट सुलगाया : “ब्लैक मार्कीट का क़िस्सा है। मुझे मालूम हुआ है कि आज मेरे गोदाम पर छापा मारा जाएगा सो मैंने सोचा कि अमीन पहलवान बेहतरीन आदमी है जो उसे निमटा सकता है।”
अमीन ने बड़े मग़्मूम और ज़ख़्मी अंदाज़ में कहा: “आप फ़रमाईए, मैं आप की क्या ख़िदमत कर सकता हूँ?”

“भई, ख़िदमत विदमत की बात तुम मत करो बस सिर्फ़ इतनी सी बात है कि जब छापा पड़े तो गोदाम के मालक तुम होगे। गिरफ़्तार हो जाओगे। ज़्यादा से ज़्यादा जुर्माना पाँच हज़ार रुपय होगा और एक दो बरस की क़ैद!”
“मुझे क्या मिलेगा?”
“जब वहां से रहा हो कर आओगे तो मुआमला तै कर लिया जाएगा।”
अमीन ने मियां साहब से कहा : “हुज़ूर, बहुत दूर की बात है जुर्माना तो आप अदा कर देंगे, लेकिन क़ैद तो मुझे काटनी पड़ेगी। आप बाक़ायदा सौदा करें।”
मियां साहब मुस्कुराए : “तुम से आज तक मैंने कभी वाअदा ख़िलाफ़ी की है पिछली दफ़ा मैंने तुम से काम लिया और तुम को तीन महीने की क़ैद हुई, तो किया मैंने जेल ख़ाने में हर क़िस्म की सहूलत बहम न पहुंचाई। तुम ने बाहर आकर मुझ से कहा कि तुम्हें वहां कोई तकलीफ़ नहीं थी
अगर तुम कुछ अर्से के लिए जेल चले गए तो वहां तुम्हें हर आसाइश होगी।”

अमीन ने कहा : “जी ये सब दरुस्त है लेकिन।”
“लेकिन क्या?”
अमीन की आँखों में आँसू आगए : “मियां साहब! मेरी माँ मर गई है।”
“कब?”
“आज सुबह।”
मियां साहब ने अफ़सोस का इज़हार किया : “कफ़ना दफ़ना दिया होगा। अमीन की आँखों में से आँसू टप टप गिरने लगे मियां साहब अभी तो कुछ भी नहीं हो सका मेरे पास तो अफ़ीम खाने के लिए भी कुछ नहीं है।”

मियां साहब ने चंद लमहात हालात पर ग़ौर किया और अमीन से कहा : “तो ऐसा करो मेरा मतलब है कि तजहीज़-ओ-तकफ़ीन का बंद-ओ-बस्त में अभी किए देता हूँ तुम्हें किसी क़िस्म का तरद्दुद नहीं करना चाहिए तुम गोदाम पर जाओ और अपनी डियूटी सँभालो।”

अमीन ने अपनी मैली क़मीस की आसतीन से आँसू पोंछे “लेकिन मियां साहब मैं मैं अपनी माँ के जनाज़े को कंधा भी न दूं!”

मियां साहिब ने फ़लसफ़ियाना अंदाज़ में कहा “ये सब रस्मी चीज़ें हैं, मरहूमा को दफनाना है। सो ये काम बड़ी अच्छी तरह से हो जाएगा तुम्हें जनाज़े के साथ जाने की क्या ज़रूरत है। तुम्हारे साथ जाने से मरहूमा को क्या राहत पहुंचेगी वो तो बेचारी इस दुनिया से रुख़स्त हो चुकी है उस के जनाज़े के साथ कोई भी जाये क्या फ़र्क़ पड़ता है। असल में तुम लोग जाहिल हो मैं अगर मर जाऊं तो मुझे क्या मालूम है कि मेरे जनाज़े में किस किस अज़ीज़ और दोस्त ने शिरकत की थी। मुझे अगर जला भी दिया जाये तो क्या फ़र्क़ पड़ता है। मेरी लाश को चीलों और गिद्धों के हवाले कर दिया जाये तो मुझे उस की क्या ख़बर होगी। तुम ज़्यादा जज़्बाती न हो, दुनिया में सब से ज़रूरी चीज़ ये है कि अपनी ज़ात के मुतअल्लिक़ सोचा जाये मैं पूछता हूँ, तुम्हारी कमाई के ज़राए क्या हैं ”
अमीन सोचने लगा। चंद लम्हात अपनी बिसात के मुताबिक़ ग़ौर करने के बाद उस ने जवाब दिया “हुज़ूर! मेरी कमाई के ज़राए आप को मालूम हैं, मुझ से क्यों पूछते हैं।”

“मैंने इस लिए पूछा था कि तुम्हें मेरा काम करने में क्या हियल ओ हुज्जत है। मैं तुम्हारी माँ की तजहीज़-ओ-तकफ़ीन का अभी बन्द-ओ-बस्त किए देता हूँ, और जब तुम जेल से वापस आओगे तो।”

अमीन पहलवान ने बड़े बैंडे अंदाज़ में पूछा “तो आप मेरा भी बन्द-ओ-बस्त कर देंगे।”
मियां साहिब बौखला गए : “तुम कैसी बातें करते हो अमीन पहलवान!”
अमीन पहलवान ने ज़रा दुरुश्त लहजे में कहा : “अमीन पहलवान की ऐसी की तैसी। आप ये बताईए कि मुझे कितने रुपय मिलेंगे मैं एक हज़ार से कम नहीं लूंगा।”
“एक हज़ार तो बहुत ज़्यादा हैं।”
अमीन ने कहा : “ज़्यादा है या कम मैं कुछ नहीं जानता मैं जब क़ैद काट कर आऊँगा तो अपनी माँ की क़ब्र पुख़्ता बनाऊंगा, संग-ए-मरमर की वो मुझ से बहुत प्यार करती है।”
मियां साहब ने उस से कहा “अच्छा भई, एक हज़ार ही ले लेना।” अमीन ने मियां साहब से कहा : “तो लाईए इतने रुपय दीजिए कि मैं कफ़न दफ़न का इंतिज़ाम कर लूं इस के बाद में आप की ख़िदमत के लिए हाज़िर हो जाऊंगा।”

मियां साहब ने अपनी जेब से बटवा निकाला “लेकिन तुम्हारा क्या भरोसा है!”
अमीन को यूं महसूस हुआ जैसे उस को किसी ने माँ बहन की गाली दी है। “मियां साहब! आप मुझे बे-ईमान समझते हैं बे-ईमान आप हैं इस लिए कि अपने फ़ेअलों का बोझ मेरे सर पर डाल रहे हैं।”
मियां साहि मौक़ा शनास थे। उन्हों ने समझा कि अमीन बिगड़ गया है, चुनांचे उन्हों ने फ़ौरन अपनी चर्ब-ज़बानी से राम करने की कोशिश की लेकिन अमीन पर कोई असर न हुआ।
जब वो घर पहुंचा तो देखा कि गुस्साल उसकी माँ को आख़िरी ग़ुस्ल दे चुके हैं। कफ़न भी पहनाया जा चुका है अमीन बहुत मुतहय्यर हुआ कि उस पर ये मेहरबानी किस ने की है मियां साहब ने लेकिन वो तो सौदा करना चाहते थे।
उस ने एक आदमी से जो ताबूत को सजाने के लिए फूल गूँध रहा था, पूछा “ये किस आदमी ने इतना एहतिमाम किया है?”
फूल वाले ने जवाब दिया : “हुज़ूर! आप की बीवी ने।”
अमीन चकरा गया वो अपने शदीद तअज्जुब का मुज़ाहिरा करता मगर ख़ामोश रहा। फूल वाले से सिर्फ़ इतना पूछा “कहाँ हैं वो ”
फूल वाले ने जवाब दिया : “जी अन्दर हैं आप का इंतिज़ार कररही थीं ”
अमीन अंदर गया तो देखा कि एक नौ-जवान, ख़ूबसूरत लड़की उस की चारपाई पर बैठी है
अमीन ने इस से पूछा “आप कौन हैं यहां क्यों आई हैं”
उस लड़की ने जवाब दिया “मैं आप की बीवी हूँ यहां क्यों आई हूँ, ये आप का अजीब-ओ-ग़रीब सवाल है।”
अमीन ने उस से पूछा : “मेरी बीवी तो कोई भी नहीं। बताओ तुम कौन हो।”
लड़की मुस्कुराई :
मैं मियां दीन की बेटी हूँ उन से जो आप की गुफ़्तुगू हुई, मैंने सब सुनी और और ”
अमीन ने कहा :

“अब और कहने की ज़रूरत नहीं ” 

Sunday, 23 July 2017

गुलज़ार : यार जुलाहे।


   मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे  
अक्सर तुझको देखा है कि ताना बुनते 
 जब कोई तागा टूट गया या ख़तम हुआ  
फिर से बाँध के  
और सिरा कोई जोड़ के उसमें  
आगे बुनने लगते हो  
तेरे इस ताने में लेकिन  
इक भी गाँठ गिरह बुनतर की 
देख नहीं सकता है कोई  
मैंने तो इक बार बुना था एक ही रिश्ता  
लेकिन उसकी सारी गिरहें  
साफ़ नज़र आती हैं मेरे यार जुलाहे  

Ankur Srivastava | अँकुर श्रीवास्तव "श्री"


बात जब कहने लग जाये तो उसका लहजा, उसकी ज़बानी पर शक़ करो,
वो जवान जो संभल जाए सिर्फ कहने पर तो उसकी जवानी पर शक़ करो।

मोहब्बत में जो माँगने लगे वादे, खाने लगे कसमें और देने लगे निशानियाँ,
उस महबूब को, न मानो तुम सिर्फ अपना हमसाया, उसकी निशानी पर शक़ करो।

बहुत आये, जो हुए कलेजा, बहुत हुए जाते है अब भी मेहरबां जो तुम पर,
उन नूर के प्यालों पर, रेशमी शालों पर, उनकी मेहरबानी पर शक़ करो।

कभी उदास हुए जाता हूँ अब भी इस उम्र में भी आकर, शायद नादान हूँ,
गर तुम भी परेशां हो ख़ुद से, उम्र की आदतों से, तो अपनी नादानी पर शक़ करो।

कुछ होता भी है ज़िन्दगी में, जो जावेदानी हो और जिसे मान भी सको तुम?
जो भी शय देने लगे ये दिलासे, बात भरोसे पर आजाए, तो जावेदानी पर शक़ करो।

- अँकुर श्रीवास्तव "श्री"

Dr. Athar Khan | डॉ. अतहर खाँन


इस भटकते हुए दिल मे, यादों के सिवा कुछ नहीं ।
रौशनी छीन ली ज़िन्दगी ने, अंधेरों के सिवा कुछ नहीं ।।

वो महफ़िल को अपनी रंगों से सजाते रहे ।
झोली में मेरी ग़मों के सिवा कुछ नहीं ।।

उसको मिली हर ख़ुशी ज़माने की जश्न-ऐ-बज़्म में ।
हिस्से में मेरे चाक दामन के सिवा कुछ नहीं ।।

इस वीराने डगर का मै खुद ही मुहाफ़िज़ हूँ ।
जहाँ तक जाय नज़र पतझड़ के सिवा कुछ नहीं ।।

बहुत तारीफ़ सुनी थी दास्तान-ऐ-गुलिस्ताँ की 'अतहर' ।
जब रूठ जाये दिलबर तो दिल मे दर्द के सिवा कुछ नहीं ।।

Ameer Imam | अमीर इमाम

وہ خیال آیا تو ہر لمحہ دیوانہ ہو گیا
موسم تنہای پھر کتنا سہانہ ہو گیا۔
वो ख्याल आया तो हर लम्हा दिवाना हो गया
मौसम ए तन्हाई फिर कितना सुहाना हो गया.

وہ شجر جو تم نے سینچا تھا پھر اس کی شاخ پر
اک پرندہ آ کے بیٹھا اور روانہ ہو گیا۔
वो शजर जो तुमने सींचा था फिर उसकी शाख पर
इक परिंदा आके बैठा और रवाना हो गया.

صاف آتے ہیں نظر دنیا کے سارے عکس اب
تم سے بچھڑے ہیں تو دل آینہ خانہ ہو گیا
साफ आते हैं नजर दुनिया के सारे अक्स अब
तुमसे बिछड़े हैं तो दिल आईना खाना हो गया.

خرچ کرتا ہی نہیں قارون غم ہوں دوستو
جمع آنکھوں میں مری کتنا خزانہ ہو گیا۔
खर्च करता ही नहीं कारून ए गम हूं दोस्तों
जम्आ आंखों में मिरी कितना खजाना हो गया.

ساتھ روزانہ مرے چلتا ہے بازو تھام کر
وہ جسے دیکھے ہوے شاید زمانہ ہو گیا۔
साथ रोजाना मिरे चलता है बाजू थाम कर
वो जिसे देखे हुए शायद जमाना हो गया.

Saturday, 22 July 2017

मिर्ज़ा ग़ालिब | Mirza Ghalib

मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ “ग़ालिब” उर्दू एवं फ़ारसी भाषा के महान शायर थे। इनको उर्दू भाषा का सर्वकालिक महान शायर माना जाता है और फ़ारसी कविता के प्रवाह को हिन्दुस्तानी जबान में लोकप्रिय करवाने का श्रेय भी इनको दिया जाता है।  ग़ालिब के लिखे पत्र, जो उस समय प्रकाशित नहीं हुए थे, को भी उर्दू लेखन का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जाता है। ग़ालिब को भारत और पाकिस्तान में एक महत्वपूर्ण कवि के रूप में जाना जाता है। उन्हे दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद-दौला का खिताब मिला। ग़ालिब नाम से लिखने वाले मिर्ज़ा मुग़ल काल के आख़िरी शासक बहादुर शाह ज़फ़र के दरबारी कवि भी रहे थे। आगरा, दिल्ली और कलकत्ता में अपनी ज़िन्दगी गुजारने वाले ग़ालिब को मुख्यतः उनकी उर्दू ग़ज़लों को लिए याद किया जाता है।

आरंभीक जीवन:
ग़ालिब का जन्म आगरा मे एक सैनिक पृष्ठभूमि वाले परिवार में हुआ था। उन्होने अपने पिता और चाचा को बचपन मे ही खो दिया था, ग़ालिब का जीवनयापन मूलत: अपने चाचा के मरणोपरांत मिलने वाले पेंशन से होता था. (वो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी मे सैन्य अधिकारी थे). ग़ालिब की पृष्ठभूमि एक तुर्क परिवार से थी और इनके दादा मध्य एशिया के समरक़न्द से सन् १७५० के आसपास भारत आए थे। उनके दादा मिर्ज़ा क़ोबान बेग खान अहमद शाह के शासन काल में समरकंद से भारत आये। उन्होने दिल्ली, लाहौर व जयपुर मे काम किया और अन्ततः आगरा मे बस गये। उनके दो पुत्र व तीन पुत्रियां थी। मिर्ज़ा अब्दुल्ला बेग खान व मिर्ज़ा नसरुल्ला बेग खान उनके दो पुत्र थे।

मिर्जा अब्दुला बैग खान [मिर्जा ग़ालिब के पिताजी ] ने एक कश्मीरी लडकी इज्जत-उत-निसा बेगम से निकाह किया और वो अपने ससुराल में रहने लग गये | उन्होंने पहले लखनऊ के नवाब और बाद में हैदराबाद के निजाम के यहा काम किया | उनकी 1803 में अलवर में युद्ध के दौरान मौत हो गयी और उस समय मिर्जा ग़ालिब केवल पांच साल के थे | चाचा मिर्जा नसरुल्ला बैग खान ने उनका पालन पोषण किया |

इनके पूर्वज तुर्की में रहा करते थे. इनके पिता लखनऊ के नबाब के यहाँ काम करते थे, लेकिन 1803 में इनकी मौत हो गई, जिसके बाद छोटे से मिर्जा को उनके चाचा ने बड़ा किया. 11 साल की उम्र से ही मिर्ज़ा ने कविता लिखना शुरू कर दिया था. मिर्जा ने 13 साल की उम्र में उमराव बेगम से शादी कर ली. मिर्ज़ा साहब ने लाहौर, जयपुर दिल्ली में काम किया था, बाद में वे आगरा आकर रहने लगे. अपनी हर रचना वो मिर्ज़ा या ग़ालिब नाम से लिखते थे, इसलिए उनका ये नाम प्रसिध्य हुआ. 1850 में बहादुर शाह ज़फर की सत्ता में आने के बाद मिर्ज़ा ग़ालिब को मुख्य दरबारी बनाया गया. राजा को भी कविता में रूचि थी, 1854 में मिर्ज़ा इनको कविता सिखाने लगे. 1857 में जब ब्रिटिश राज से मुग़ल सेना की हार हुई, तब पूरा साम्राज्य नष्ट हो गया. मिर्ज़ा साहब को इस समय उनकी आय मिलना भी बंद हो गई थी.

केवल 13 वर्ष की उम्र में उनका निकाह नवाब इलाही बक्श की बेटी उमराव बेगम से हो गया |इसके बाद वो अपने छोटे भाई मिर्जा युसूफ खान के साथ दिल्ली में बस गये लेकिन उनके छोटे भाई की एक दिमागी बीमारी की वजह से चोटी उम्र में ही मौत हो गयी | उनके सात बच्चे पैदा होने से पहले ही मर गये थे | उन्होंने सोचा अब ये दुःख तो जीवन के साथ ही खत्म होगा | उन्होंने एक कविता में भी इसका जिक्र किया “”क़ैद-ए-हयात-ओ-बंद-ए-ग़म, अस्ल में दोनों एक हैं,मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाए क्यूँ? |

गालिब को बचपन में ही पतंग, शतरंज और जुए की आदत लगी लेकिन दूसरी ओर उच्च कोटि के बुजुर्गों की सोहबत का लाभ मिला. शिक्षित मां ने गालिब घर पर ही शिक्षा दी जिसकी वजह से उन्हें नियमित शिक्षा कुछ ज़्यादा नहीं मिल सकी. फारसी की प्रारम्भिक शिक्षा इन्होंने आगरा के पास उस समय के प्रतिष्ठित विद्वान ‘मौलवी मोहम्मद मोवज्जम’ से प्राप्त की. ज्योतिष, तर्क, दर्शन, संगीत एवं रहस्यवाद इत्यादि से इनका कुछ न कुछ परिचय होता गया. गालिब की ग्रहण शक्ति इतनी तीव्र थी कि वह न केवल जहूरी जैसे फारसी कवियों का अध्ययन अपने आप करने लगे. बल्कि फारसी में गजलें भी लिखने लगें.

कहा जाता है कि जिस वातावरण में गालिब का लालन पालन हुआ वहां से उन्हें शायर बनने की प्रेरणा मिली. जिस मुहल्ले में गालिब रहते थे, वह (गुलाबखाना) उस जमाने में फारसी भाषा के शिक्षण का उच्च केन्द्र था. वहां मुल्ला वली मुहम्मद, उनके बेटे शम्सुल जुहा, मोहम्मद बदरुद्दिजा, आज़म अली तथा मौहम्मद कामिल वगैरा फारसी के एक-से-एक विद्वान वहां रहते थे. शायरी की शुरुआत उन्होंने 10 साल की उम्र में ही कर दी थी लेकिन 25 साल की उम्र तक आते-आते वह बड़े शायर बन चुके थे. अपने जीवन काल में ही गालिब एक लोकप्रिय शायर के रूप में विख्यात हुई. 19वीं और 20वीं शताब्दी में उर्दू और फारसी के बेहतरीन शायर के रूप में उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली तथा अरब एवं अन्य राष्ट्रों में भी वे अत्यन्त लोकप्रिय हुए. गालिब की शायरी में एक तड़प, एक चाहत और एक कशिश अंदाज पाया जाता है. जो सहज ही पाठक के मन को छू लेता है.

शाही खिताब:
१८५० मे शहंशाह बहादुर शाह ज़फ़र २ ने मिर्ज़ा गालिब को "दबीर-उल-मुल्क" और "नज़्म-उद-दौला" के खिताब से नवाज़ा। बाद मे उन्हे "मिर्ज़ा नोशा" क खिताब भी मिला। वे शहंशाह के दरबार मे एक महत्वपुर्ण दरबारी थे। उन्हे बहादुर शाह ज़फर २ के ज्येष्ठ पुत्र राजकुमार फ़क्र-उद-दिन मिर्ज़ा का शिक्षक भी नियुक्त किया गया। वे एक समय मे मुगल दरबार के शाही इतिहासविद भी थे।

शायरी:
गैर ले महफ़िल में बोसे जाम के
हम रहें यूँ तश्ना-ऐ-लब पैगाम के
खत लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के
इश्क़ ने “ग़ालिब” निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे काम के.

दिया है दिल अगर उस को , बशर है क्या कहिये
हुआ रक़ीब तो वो , नामाबर है , क्या कहिये
यह ज़िद की आज न आये और आये बिन न रहे
काजा से शिकवा हमें किस क़दर है , क्या कहिये
ज़ाहे -करिश्मा के यूँ दे रखा है हमको फरेब
की बिन कहे ही उन्हें सब खबर है , क्या कहिये
समझ के करते हैं बाजार में वो पुर्सिश -ऐ -हाल
की यह कहे की सर -ऐ -रहगुज़र है , क्या कहिये
तुम्हें नहीं है सर-ऐ-रिश्ता-ऐ-वफ़ा का ख्याल
हमारे हाथ में कुछ है , मगर है क्या कहिये
कहा है किस ने की “ग़ालिब ” बुरा नहीं लेकिन
सिवाय इसके की आशुफ़्तासार है क्या कहिये.

मैं उन्हें छेड़ूँ और कुछ न कहें ,
चल निकलते जो में पिए होते .
क़हर हो या भला हो , जो कुछ हो ,
काश के तुम मेरे लिए होते .
मेरी किस्मत में ग़म गर इतना था ,
दिल भी या रब कई दिए होते.
आ ही जाता वो राह पर ‘ग़ालिब ’,
कोई दिन और भी जिए होते.
दिले-नादां तुझे हुआ क्या है,
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है.
हम हैं मुशताक और वो बेज़ार,
या इलाही ये माजरा क्या है.
मैं भी मूंह में ज़ुबान रखता हूं,
काश पूछो कि मुद्दआ क्या है.
जबकि तुज बिन नहीं कोई मौजूद,
फिर ये हंगामा-ए-ख़ुदा क्या है.
ये परी चेहरा लोग कैसे है,
ग़मज़ा-ओ-इशवा-यो अदा क्या है.
शिकने-ज़ुल्फ़-ए-अम्बरी क्या है,
निगह-ए-चशम-ए-सुरमा क्या है.
सबज़ा-ओ-गुल कहां से आये हैं,
अबर क्या चीज है हवा क्या है.
हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद,
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है.
हां भला कर तेरा भला होगा,
और दरवेश की सदा क्या है.
जान तुम पर निसार करता हूं,
मैं नहीं जानता दुआ क्या है.
मैंने माना कि कुछ नहीं 'ग़ालिब',
मुफ़त हाथ आये तो बुरा क्या है.

घर हमारा जो न रोते भी तो वीरां होता
बहर गर बहर न होता तो बयाबां होता
तंगी-ए-दिल का गिला क्या ये वो काफ़िर दिल है
कि अगर तंग न होता तो परेशां होता
वादे-यक उम्र-वराय बार तो देता बारे
काश रिज़वां ही दरे-यार का दरबां होता

कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती
मौत का एक दिन मुअय्यन है
नींद कयों रात भर नहीं आती
आगे आती थी हाले-दिल पे हंसी
अब किसी बात पर नहीं आती
जानता हूं सवाबे-ताअत-ओ-ज़ोहद
पर तबीयत इधर नहीं आती
है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूं
वरना क्या बात कर नहीं आती
कयों न चीखूं कि याद करते हैं
मेरी आवाज़ गर नहीं आती
दाग़े-दिल गर नज़र नहीं आता
बू भी ऐ बूए चारागर नहीं आती
हम वहां हैं जहां से हमको भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती
मरते हैं आरजू में मरने की
मौत आती है पर नहीं आती
काबा किस मूंह से जाओगे 'ग़ालिब'
शरम तुमको मगर नहीं आती

मेहरबां हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वकत
मैं गया वकत नहीं हूं कि फिर आ भी न सकूं
जोफ़ में ताना-ए-अग़यार का शिकवा क्या है
बात कुछ सर तो नहीं है कि उठा भी न सकूं
ज़हर मिलता ही नहीं मुझको सितमगर वरना
क्या कसम है तिरे मिलने की कि खा भी न सकूं

म्रुत्यू:
ग़ालिब की मुगल दरबार में बहुत इज्जत थी और वो उन पर व्यग्य करने वालो पर शायरी लिख दिया करते थे | उनकी 15 फरवरी 1869 को दिल्ली में मौत हो गयी | ग़ालिब पुरानी दिल्ली के जिस मकान में रहते थे उसको ग़ालिब की हवेली कहा जाने लगा और बाद में उसे एक स्मारक में तब्दील कर दिया गया |ग़ालिब की कब्र दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में निजामुद्दीन ओलिया के नजदीक बनाई गयी.

JAUN ELIA : Gaahe-gaahe ab yehi ho kya.

Gaahe-gaahe ab yehi ho kya, 
Tum se mil kar bohat khushi ho kya, 

Mil rahi ho barre tapaak ke sath, Mujh ko yaksar bhula chuki ho kya, 

Yaad hain ab bhi apne khawb tumhen, 
Mujh se mil kar udaas bhi ho kya,

Bas mujhe yuun hi ik khayal aya, Sochti ho to sochti ho kya,  

Kya kaha ishq javedani hai, 
Aakhri bar mil rahi ho kya,  

Mere sab tanz be-assar hi rahe, 
Tum bohat door ja chuki ho kya,  

Dil main ab soz-e-intezar nahin, Shama-e-umeed bujh gayi ho kya, 

Is samandar tishna-kaaam hoon main, 
Baan tum ab bhi beh rahi ho kya.

- Jaun Elia

रात आ जाए तो फिर

रात आ जाए तो फिर तुझ को पुकारूँ या-रब ।
मेरी आवाज़ उजाले में बिखर जाती है ।।

- साभार

Friday, 21 July 2017

Bazm | बज़्म | بزم

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क्या लिखना चाहता है ये कवि ?

MAYANK BOKOLIA मैं कविता लिखना चाहता हूँ "आज़ादी पर" कोरे कागज़ पर कलम रख उकेरना चाहता हूँ वो सब जो मैं जी रहा हूँ वो सब जो...