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Sunday, 23 July 2017

गुलज़ार : यार जुलाहे।


   मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे  
अक्सर तुझको देखा है कि ताना बुनते 
 जब कोई तागा टूट गया या ख़तम हुआ  
फिर से बाँध के  
और सिरा कोई जोड़ के उसमें  
आगे बुनने लगते हो  
तेरे इस ताने में लेकिन  
इक भी गाँठ गिरह बुनतर की 
देख नहीं सकता है कोई  
मैंने तो इक बार बुना था एक ही रिश्ता  
लेकिन उसकी सारी गिरहें  
साफ़ नज़र आती हैं मेरे यार जुलाहे  

क्या लिखना चाहता है ये कवि ?

MAYANK BOKOLIA मैं कविता लिखना चाहता हूँ "आज़ादी पर" कोरे कागज़ पर कलम रख उकेरना चाहता हूँ वो सब जो मैं जी रहा हूँ वो सब जो...